सरकार आपकी, शेर हैं आप, पुलिस और प्रशासन भी आपका है, डर भी आप ही को
लग रहा है. आमिर ख़ान की बीवी किरण राव को डर लगता है वो ग़लत है, आपका
वाला डर सच्चा है. क्या ग़ज़ब का डर है.हन भागवत ने कहा कि सभी हिंदू दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं, वे
ईमानदारी से ऐसा करना चाहते हैं. उन्होंने कहा, "हमारा उद्देश्य किसी पर
वर्चस्व कायम करना नहीं रहा है, इतिहास में हमारा प्रभाव बहुत रहा है और
मेक्सिको से साइबेरिया तक, वहां पर हिंदू साम्राज्य थे, आज भी उन प्रभावों
को देखा जा सकता है, और कमाल की बात है कि वहां के लोग इन प्रभावों को
संजोकर रखते हैं."
उन्होंने इनके नाम तो नहीं लिए लेकिन माया, इन्का, यूनान और मिस्र जैसी प्राचीन सभ्यताओं के सभी प्रकृतिपूजकों और मूर्तिपूजकों को एक झटके में हिंदू घोषित कर दिया, उन्हें हिंदू साम्राज्य बताकर, वो भारत को गौरवशाली हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए जोश का वातावरण तैयार करना चाहते हैं.
अपने भाषण में भागवत ने महाभारत का ज़िक्र छेड़ा, उन्होंने कहा कि "आज के आधुनिक समय में हिंदुओं की अवस्था वही है जो महाभारत में पांडवों की थी."
इस छोटे से वाक्य में गहरे अर्थ छिपे हैं, ये कि हिंदू पीड़ित हैं, अन्याय के शिकार हैं और उन्हें अपने अधिकार हासिल करने के लिए धर्मयुद्ध लड़ना होगा. इसके बाद वो हनुमान की कथा सुनाने लगे कि कैसे उन्होंने दृढ़ संकल्प से समुद्र पार कर लिया.
उन्होंने कहा, "हिंदुओं के सारे काम सबके कल्याण के लिए होते हैं, हिंदू कभी किसी का विरोध करने के लिए नहीं जीते. दुनिया भर में कीटनाशक इस्तेमाल होते हैं, लेकिन हिंदू वह समाज है जिसने कीट-पतंगों के जीवित रहने के अधिकार को स्वीकार किया." उन्होंने बताया कि हिंदू कितने सहिष्णु हैं, लेकिन मौजूदा हालात में कीड़े-मकौड़े किनको कहा जा रहा है, ये उन्होंने लोगों की कल्पना पर छोड़ दिया.
भागवत ने कहा कि "हम किसी का विरोध नहीं करते, लेकिन ऐसे लोग हैं जो हमारा विरोध करते हैं, ऐसे लोगों से निबटना होगा, और उसके लिए हमें हर साधन, हर उपकरण चाहिए ताकि हम अपनी रक्षा कर सकें कि वे हमें नुकसान न पहुंचा सकें." वे लोग कौन हैं फिर नहीं बताया गया, सब जानते तो हैं ही. मोहन भागवत ने एक बेहद ज़रूरी बात बताई जिससे संघ की कार्यशैली का अंदाज़ा मिलता है. उन्होंने विस्तार से समझाया किस तरह लोगों को एक-दूसरे का साथ देना चाहिए, न कि एक-दूसरे का विरोध करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सबको अपने-अपने तरीक़े से लक्ष्य को ध्यान में रखकर, अपने आगे चल रहे लोगों से कदम मिलाकर चलना चाहिए.
उन्होंने अँग्रेज़ी का मुहावरा इस्तेमाल किया, 'लर्न टू वर्क टूगेदर सेपरेटली' यानी साथ मिलकर अलग-अलग काम करना सीखें. यही संघ के काम करने का तरीका है, वह सैकड़ों छोटे संगठनों के ज़रिए काम करता है, सब अलग-अलग काम करते हैं और सब एक ही लक्ष्य के लिए काम करते हैं, वक़्त-ज़रूरत के हिसाब रास्ते चुनते हैं, लेकिन उनके किसी भी काम की कोई ज़िम्मेदारी संघ की नहीं होती.
एक-दूसरे से दूरी रखते हुए, निकटता बनाए रखना और एक तरह से अदृश्य शक्ति में बदल जाना यही संघ का मायावी रूप रहा है. मिसाल के तौर पर अगर किसी अवैध या हिंसक गतिविधि में बजरंग दल या विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता पकड़े जाते हैं, ऐसा अनेक बार हो चुका है, तो कोई ये नहीं कह पाता कि संघ का इसमें कोई हाथ है क्योंकि यहीं 'वर्किंग टूगेदर सेपरेटली' काम आता है, जिसका ज्ञान शिकागो में मिला.
भागवत ने कहा कि महाभारत में कृष्ण युधिष्ठिर को कभी रोकते-टोकते नहीं हैं, युधिष्ठिर जो हमेशा सच बोलने की वजह से धर्मराज कहे जाते हैं, "कृष्ण के कहने पर वही युधिष्ठिर लड़ाई के मैदान में ऐसा कुछ कहते हैं जो सच नहीं है". उन्होंने ज़्यादा विवरण नहीं दिया, उनका इशारा युधिष्ठिर के उस अर्धसत्य की तरफ़ था जब उन्होंने कहा था-अश्वत्थामा मारा गया.
भागवत का इशारा यही था कि परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नेतृत्व अगर झूठ बोले या बोलने को कहे तो इसमें कोई बुराई नहीं है, मतलब साफ़ था कि कोई धर्मराज से बड़ा सत्यवादी बनने की कोशिश न करे. उन्होंने कहा कि सबको अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए, रामलीला की तरह जिसमें कोई राम बनता है, कोई रावण, लेकिन सबको असल में याद रखना चाहिए वे कौन हैं और उनका लक्ष्य क्या है.
अब उन्हें यह बताने की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी कि वह लक्ष्य क्या है? वह लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना है.
अपने 41 मिनट लंबे भाषण में उन्होंने विवेकानंद का नाम सिर्फ़ एक बार यह साबित करने के लिए लिया कि वे जो कह रहे हैं वह सही है. वैसे भी संघ के लोग कभी नहीं बताते विवेकानंद, भगत सिंह, सरदार पटेल या महात्मा गांधी या किसी दूसरी अमर विभूति ने दरअसल कहा क्या था क्योंकि उस
भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) में दो दशक पहले तक भ्रूण की कोई परिभाषा ही नहीं थी.
में बड़े ख़तरे हैं.8 साल की पीड़िता के गर्भ में पल रहा भ्रूण 27 हफ़्ते का हो गया है और डॉक्टरों के मुताबिक उसे गिराने से मां की जान को ख़तरा हो सकता है.
इससे पहले अदालत ने ये भी कहा कि ऐसे मसले में भ्रूण के अधिकारों की समीक्षा भी करनी चाहिए.
भारतीय संविधान की धारा 21 के मुताबिक हर व्यक्ति को आज़ादी से जीने का अधिड़की पसंद ना करने के अलावा भी गर्भपात की और वजहें हो सकती हैं. मसलन बलात्कार की वजह से गर्भवती हुई महिला या गर्भ-निरोधक के ना काम करने पर गर्भवती हुई महिला जब बच्चा ना पैदा करना चाहे.
लेकिन कुछ दशक पहले तक भारत में गर्भपात पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी था. सिर्फ़ एक ही सूरत में इसकी अनुमति थी - अगर बच्चा पैदा करने से महिला की जान को ख़तरा हो.
इसलिए 1971 में गर्भपात के लिए नया क़ानून, 'द मेडिकल टरमिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी ऐक्ट' यानी एमटीपी ऐक्ट पारित हुआ और इसमें गर्भ धारण करने के 20 हफ़्तों तक गर्भपात करवाने को क़ानूनी अनुमति दी गई.
इस अनुमति की शर्त ये कि बच्चा पैदा करने से मां को शारीरिक या मानसिक हानि पहुंचती हो और पैदा होनेवाले बच्चे में मानसिक या शारीरिक विकलांगता होने की संभावना हो.
भ्रूण के जीवन के बारे में ये फ़ैसला करने पर मां और पिता राय और सहमति तो दे सकते हैं, लेकिन आख़िरी फ़ैसले का अधिकार डॉक्टर के पास रहता है.
12 हफ़्ते से पहले गर्भ गिराने का फ़ैसला एक पंजीकृत डॉक्टर कर सकता है और 12 से 20 हफ़्ते तक विकसित हो चुके भ्रूण के फ़ैसले में दो पंजीकृत डॉक्टरों की राय ज़रूरी है.
कार है जब तक वो किसी क़ानून का उल्लंघन नहीं कर रहा हो.
सवाल ये कि क्या भ्रूण को व्यक्ति का दर्जा दिया जा सकता है? दुनियाभर में इस पर एक राय नहीं है.में जब गर्भ में पल रहे भ्रूण की लिंग जांच को ग़ैर-क़ानूनी बनाने वाला पीसीपीएनडीटी क़ानूनड़कियों के मुकाबले लड़के पसंद करनेवाली सोच की वजह से भ्रूण की लिंग जांच कर, गर्भपात करवाया जाता रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका 'लैनसेट' के शोध के मुताबिक़ 1980 से 2010 के बीच भारत में एक करोड़ से ज़्यादा भ्रूण इसलिए गिरा दिए गए क्योंकि लिंग जांच में पाया गया कि वो पैदा होकर लड़की होंगे.
ऐसी भ्रूण हत्या को रोकने के मक़सद से लाए गए पीसीपीएनडीटी ऐक्ट के तहत, लिंग जांच करवाने के लिए डॉक्टर और परिवारवालों - सभी को तीन साल की सज़ा और जुर्माना हो सकता है.
लाया गया, तब भ्रूण पहली बार परिभाषित हुआ.
एक औरत के गर्भ में पल रहे एम्ब्रियो को आठ हफ़्ते बाद यानी 57वें दिन से बच्चा पैदा होने तक क़ानून की नज़र में 'फ़ीटस' यानी 'भ्रूण' माना गया. गर एमटीपी ऐक्ट की शर्तें पूरी ना हों और एक औरत अपना भ्रूण गिरवा दे या कोई और उसका गर्भपात करवा दे तो ये अब भी जुर्म है जिसके लिए उस औरत को ही तीन साल की सज़ा और जुर्माना हो सकता है.
गर्भवती औरत की जानकारी के बिना उसका गर्भपात करवाने पर उम्रक़ैद हो सकती है.
गर्भपात करवाने की नीयत से औरत की हत्या करना या कोई भी ऐसा काम करना जिसका मक़सद हो कि पैदा होने से पहले ही गर्भ में बच्चा मर जाए या पैदा होने के फ़ौरन बाद बच्चा मर जाए तो इसके लिए 10 साल की सज़ा हो सकती है.
अगर एक व्यक्ति की वजह से गर्भवती महिला की मौत हो जाए या उसे इतनी चोट लगे की कोख में पल रहे भ्रूण की मौत हो जाए तो इसे 'कल्पेबल होमिसाइड' यानी ग़ैर-इरादतन हत्या माना जाएगा जिसके लिए 10 साल की सज़ा हो सकती है.
उन्होंने इनके नाम तो नहीं लिए लेकिन माया, इन्का, यूनान और मिस्र जैसी प्राचीन सभ्यताओं के सभी प्रकृतिपूजकों और मूर्तिपूजकों को एक झटके में हिंदू घोषित कर दिया, उन्हें हिंदू साम्राज्य बताकर, वो भारत को गौरवशाली हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए जोश का वातावरण तैयार करना चाहते हैं.
अपने भाषण में भागवत ने महाभारत का ज़िक्र छेड़ा, उन्होंने कहा कि "आज के आधुनिक समय में हिंदुओं की अवस्था वही है जो महाभारत में पांडवों की थी."
इस छोटे से वाक्य में गहरे अर्थ छिपे हैं, ये कि हिंदू पीड़ित हैं, अन्याय के शिकार हैं और उन्हें अपने अधिकार हासिल करने के लिए धर्मयुद्ध लड़ना होगा. इसके बाद वो हनुमान की कथा सुनाने लगे कि कैसे उन्होंने दृढ़ संकल्प से समुद्र पार कर लिया.
उन्होंने कहा, "हिंदुओं के सारे काम सबके कल्याण के लिए होते हैं, हिंदू कभी किसी का विरोध करने के लिए नहीं जीते. दुनिया भर में कीटनाशक इस्तेमाल होते हैं, लेकिन हिंदू वह समाज है जिसने कीट-पतंगों के जीवित रहने के अधिकार को स्वीकार किया." उन्होंने बताया कि हिंदू कितने सहिष्णु हैं, लेकिन मौजूदा हालात में कीड़े-मकौड़े किनको कहा जा रहा है, ये उन्होंने लोगों की कल्पना पर छोड़ दिया.
भागवत ने कहा कि "हम किसी का विरोध नहीं करते, लेकिन ऐसे लोग हैं जो हमारा विरोध करते हैं, ऐसे लोगों से निबटना होगा, और उसके लिए हमें हर साधन, हर उपकरण चाहिए ताकि हम अपनी रक्षा कर सकें कि वे हमें नुकसान न पहुंचा सकें." वे लोग कौन हैं फिर नहीं बताया गया, सब जानते तो हैं ही. मोहन भागवत ने एक बेहद ज़रूरी बात बताई जिससे संघ की कार्यशैली का अंदाज़ा मिलता है. उन्होंने विस्तार से समझाया किस तरह लोगों को एक-दूसरे का साथ देना चाहिए, न कि एक-दूसरे का विरोध करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सबको अपने-अपने तरीक़े से लक्ष्य को ध्यान में रखकर, अपने आगे चल रहे लोगों से कदम मिलाकर चलना चाहिए.
उन्होंने अँग्रेज़ी का मुहावरा इस्तेमाल किया, 'लर्न टू वर्क टूगेदर सेपरेटली' यानी साथ मिलकर अलग-अलग काम करना सीखें. यही संघ के काम करने का तरीका है, वह सैकड़ों छोटे संगठनों के ज़रिए काम करता है, सब अलग-अलग काम करते हैं और सब एक ही लक्ष्य के लिए काम करते हैं, वक़्त-ज़रूरत के हिसाब रास्ते चुनते हैं, लेकिन उनके किसी भी काम की कोई ज़िम्मेदारी संघ की नहीं होती.
एक-दूसरे से दूरी रखते हुए, निकटता बनाए रखना और एक तरह से अदृश्य शक्ति में बदल जाना यही संघ का मायावी रूप रहा है. मिसाल के तौर पर अगर किसी अवैध या हिंसक गतिविधि में बजरंग दल या विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता पकड़े जाते हैं, ऐसा अनेक बार हो चुका है, तो कोई ये नहीं कह पाता कि संघ का इसमें कोई हाथ है क्योंकि यहीं 'वर्किंग टूगेदर सेपरेटली' काम आता है, जिसका ज्ञान शिकागो में मिला.
भागवत ने कहा कि महाभारत में कृष्ण युधिष्ठिर को कभी रोकते-टोकते नहीं हैं, युधिष्ठिर जो हमेशा सच बोलने की वजह से धर्मराज कहे जाते हैं, "कृष्ण के कहने पर वही युधिष्ठिर लड़ाई के मैदान में ऐसा कुछ कहते हैं जो सच नहीं है". उन्होंने ज़्यादा विवरण नहीं दिया, उनका इशारा युधिष्ठिर के उस अर्धसत्य की तरफ़ था जब उन्होंने कहा था-अश्वत्थामा मारा गया.
भागवत का इशारा यही था कि परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नेतृत्व अगर झूठ बोले या बोलने को कहे तो इसमें कोई बुराई नहीं है, मतलब साफ़ था कि कोई धर्मराज से बड़ा सत्यवादी बनने की कोशिश न करे. उन्होंने कहा कि सबको अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए, रामलीला की तरह जिसमें कोई राम बनता है, कोई रावण, लेकिन सबको असल में याद रखना चाहिए वे कौन हैं और उनका लक्ष्य क्या है.
अब उन्हें यह बताने की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी कि वह लक्ष्य क्या है? वह लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना है.
अपने 41 मिनट लंबे भाषण में उन्होंने विवेकानंद का नाम सिर्फ़ एक बार यह साबित करने के लिए लिया कि वे जो कह रहे हैं वह सही है. वैसे भी संघ के लोग कभी नहीं बताते विवेकानंद, भगत सिंह, सरदार पटेल या महात्मा गांधी या किसी दूसरी अमर विभूति ने दरअसल कहा क्या था क्योंकि उस
भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) में दो दशक पहले तक भ्रूण की कोई परिभाषा ही नहीं थी.
में बड़े ख़तरे हैं.8 साल की पीड़िता के गर्भ में पल रहा भ्रूण 27 हफ़्ते का हो गया है और डॉक्टरों के मुताबिक उसे गिराने से मां की जान को ख़तरा हो सकता है.
इससे पहले अदालत ने ये भी कहा कि ऐसे मसले में भ्रूण के अधिकारों की समीक्षा भी करनी चाहिए.
भारतीय संविधान की धारा 21 के मुताबिक हर व्यक्ति को आज़ादी से जीने का अधिड़की पसंद ना करने के अलावा भी गर्भपात की और वजहें हो सकती हैं. मसलन बलात्कार की वजह से गर्भवती हुई महिला या गर्भ-निरोधक के ना काम करने पर गर्भवती हुई महिला जब बच्चा ना पैदा करना चाहे.
लेकिन कुछ दशक पहले तक भारत में गर्भपात पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी था. सिर्फ़ एक ही सूरत में इसकी अनुमति थी - अगर बच्चा पैदा करने से महिला की जान को ख़तरा हो.
इसलिए 1971 में गर्भपात के लिए नया क़ानून, 'द मेडिकल टरमिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी ऐक्ट' यानी एमटीपी ऐक्ट पारित हुआ और इसमें गर्भ धारण करने के 20 हफ़्तों तक गर्भपात करवाने को क़ानूनी अनुमति दी गई.
इस अनुमति की शर्त ये कि बच्चा पैदा करने से मां को शारीरिक या मानसिक हानि पहुंचती हो और पैदा होनेवाले बच्चे में मानसिक या शारीरिक विकलांगता होने की संभावना हो.
भ्रूण के जीवन के बारे में ये फ़ैसला करने पर मां और पिता राय और सहमति तो दे सकते हैं, लेकिन आख़िरी फ़ैसले का अधिकार डॉक्टर के पास रहता है.
12 हफ़्ते से पहले गर्भ गिराने का फ़ैसला एक पंजीकृत डॉक्टर कर सकता है और 12 से 20 हफ़्ते तक विकसित हो चुके भ्रूण के फ़ैसले में दो पंजीकृत डॉक्टरों की राय ज़रूरी है.
कार है जब तक वो किसी क़ानून का उल्लंघन नहीं कर रहा हो.
सवाल ये कि क्या भ्रूण को व्यक्ति का दर्जा दिया जा सकता है? दुनियाभर में इस पर एक राय नहीं है.में जब गर्भ में पल रहे भ्रूण की लिंग जांच को ग़ैर-क़ानूनी बनाने वाला पीसीपीएनडीटी क़ानूनड़कियों के मुकाबले लड़के पसंद करनेवाली सोच की वजह से भ्रूण की लिंग जांच कर, गर्भपात करवाया जाता रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका 'लैनसेट' के शोध के मुताबिक़ 1980 से 2010 के बीच भारत में एक करोड़ से ज़्यादा भ्रूण इसलिए गिरा दिए गए क्योंकि लिंग जांच में पाया गया कि वो पैदा होकर लड़की होंगे.
ऐसी भ्रूण हत्या को रोकने के मक़सद से लाए गए पीसीपीएनडीटी ऐक्ट के तहत, लिंग जांच करवाने के लिए डॉक्टर और परिवारवालों - सभी को तीन साल की सज़ा और जुर्माना हो सकता है.
लाया गया, तब भ्रूण पहली बार परिभाषित हुआ.
एक औरत के गर्भ में पल रहे एम्ब्रियो को आठ हफ़्ते बाद यानी 57वें दिन से बच्चा पैदा होने तक क़ानून की नज़र में 'फ़ीटस' यानी 'भ्रूण' माना गया. गर एमटीपी ऐक्ट की शर्तें पूरी ना हों और एक औरत अपना भ्रूण गिरवा दे या कोई और उसका गर्भपात करवा दे तो ये अब भी जुर्म है जिसके लिए उस औरत को ही तीन साल की सज़ा और जुर्माना हो सकता है.
गर्भवती औरत की जानकारी के बिना उसका गर्भपात करवाने पर उम्रक़ैद हो सकती है.
गर्भपात करवाने की नीयत से औरत की हत्या करना या कोई भी ऐसा काम करना जिसका मक़सद हो कि पैदा होने से पहले ही गर्भ में बच्चा मर जाए या पैदा होने के फ़ौरन बाद बच्चा मर जाए तो इसके लिए 10 साल की सज़ा हो सकती है.
अगर एक व्यक्ति की वजह से गर्भवती महिला की मौत हो जाए या उसे इतनी चोट लगे की कोख में पल रहे भ्रूण की मौत हो जाए तो इसे 'कल्पेबल होमिसाइड' यानी ग़ैर-इरादतन हत्या माना जाएगा जिसके लिए 10 साल की सज़ा हो सकती है.
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