Friday, October 12, 2018

रफ़ाएल डील: ओलांद के बयान के बाद क्या बोली फ़्रांस सरकार?

भारत और फ़्रांस के बीच रफ़ाएल लड़ाकू विमानों को लेकर हुए समझौते पर फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के एक बयान से शुरू हुए विवाद के बीच फ़्रांस के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया है.
इस बयान में कहा गया है कि फ़्रांस की सरकार 'भारतीय पार्टनरों के चयन में किसी तरह शामिल नहीं' है.
इस बयान में कहा गया है, " फ़्रांस की सरकार किसी भी तरह से भारतीय औद्योगिक साझेदारों के चयन में शामिल नहीं है. उनका चयन फ़्रांस की कंपनियों को करना है. भारतीय अधिग्रहण प्रक्रिया के मुताबिक फ़्रांस की कंपनियों के पास ये पूरी आज़ादी है कि वो उन भारतीय साझेदार कंपनियों को चुनें जिन्हें वो सबसे ज़्यादा उपयुक्त समझती हैं और उसके बाद, ऐसी विदेशी परियोजनाएं जो उन्हें भारत में इन साझेदारों के ज़रिए पूरी करनी है, के लिए उन्हें भारतीय सरकार के सामने अनुमोदन के लिए पेश करें."
इस बयान के जारी होने के पहले फ़्रांस की मीडिया में आई रिपोर्टों में पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का एक बयान सामने आया जिसमें दावा किया गया था कि रफ़ाएल विमान बनाने के 58 हज़ार करोड़ रुपये के समझौते के लिए भारत सरकार ने ही रिलायंस डिफ़ेंस का नाम सुझाया था और फ़्रांस के पास इस संबंध में कोई विकल्प नहीं था.
फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से किया गया यह दावा भारत सरकार के बयान से उलट है. भारत सरकार कहती रही है कि फ़्रांसीसी कंपनी दसो एविएशन ने ख़ुद अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफ़ेंस का चुनाव किया था.
फ़्रांस के विदेश मंत्रालय का बयान मीडिया में आए ओलांद के बयान के बाद जारी किया गया.
बयान में आगे कहा गया है, "फ़्रांस की कंपनियों ने भारत की सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कई कंपनियों के साथ भारतीय क़ानून के तहत समझौतों पर दस्तख़त किए हैं."रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का बयान सामने आने के बाद भारतीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा,"पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के संबंध में इस रिपोर्ट की जांच की जा रही है कि उन्होंने ऐसा कहा कि भारत सरकार ने रफ़ाएल समझौता एक ख़ास कंपनी से करने का दबाव बनाया था. हम दोहराते हैं कि न ही भारत सरकार और न ही फ़्रांस की सरकार का इस वाणिज्यिक समझौते में कोई हाथ था."
रफ़ाएल विमान बनाने वाली फ़्रांसीसी कंपनी दसो एविएशन ने इस समझौते को पूरा करने के लिए रिलायंस डिफेंस को अपना साझेदार चुना था.
ओलांद के हवाले से किए गए इस दावे ने भारत में राजनीतिक सरगर्मियां और बढ़ा दी हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस पर आक्रामक रुख़ अपनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है.
शुक्रवार को उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "ख़ुद प्रधानमंत्री ने बंद कमरों में बातचीत करके रफाल समझौते को बदला. फ्रांस्वा ओलांद का शुक्रिया. अब हम जानते हैं कि ख़ुद मोदी ने बिलियन डॉलर्स की ये डील दिवालिया अनिल अंबानी को दिलवाई. प्रधानमंत्री ने भारत के साथ धोखा किया है. उन्होंने हमारे सैनिकों के ख़ून का अपमान किया है."
कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बजाय अनिल अंबानी को यह कॉन्ट्रैक्ट दिलवाया था. सरकार इन आरोपों से इनकार करती है.

Thursday, October 4, 2018

सात रोहिंग्या शरणार्थी को वापस भेजने पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने महज कुछ घंटों बाद मणिपुर से रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजे पर रोक लगाने से गुरुवार को साफ इनकार कर दिया। भारत की तरफ से आधिकारिक तौर पर म्यांमार प्रत्यर्पण का यह पहला मामला है।
वकील प्रशांत भूषण ने इस में सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की थी और कहा था कि यह अदालत का कर्तव्य है कि वह राज्य विहीन रोहिंग्या शरणार्थियों की रक्षा करे।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रशांत भूषण से कहा कि उन्हें इस बात को याद दिलाने की कोई आवश्यता नहीं है कि जजों की क्या जिम्मेदारियां हैं। गृह मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर कहा था कि सात रोहिंग्या अपनी सजा पूरी करने के बाद वापस म्यांमार जाने को तैयार हैं। अवैध प्रवासी थे और उन्हें फॉरनर्स एक्ट में दोषी पाया गया था।
सरकार की तरफ से पेश हुए सीनियर कानूनी अधिकारी तुषार मेहता ने कोर्ट से बताया कि म्यांमार सरकार ने इस बात को माना है कि वे उनके नागरिक हैं और उनको पहचान के लिए सार्टिफिकेट दिए हैं ताकि उनकी वापसी हो सके।
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस के कौल तथा न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने यह आदेश दिया। 
गौरतलब है कि न्यायालय में बुधवार को एक याचिका दाखिल कर केंद्र को असम के सिलचर में हिरासत केंद्र में बंद सात रोहिंग्याओं को म्यामां भेजने से रोकने का अनुरोध किया गया था। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बुधवार को कहा था कि रोहिंग्या प्रवासियों को गुरुवार को मणिपुर में मोरे सीमा चौकी पर म्यामां अधिकारियों को सौंपा जाएगा। 
सात रोहिंग्याओं के प्रस्तावित निर्वासन को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने के अनुरोध वाली यह अंतरिम याचिका पहले से ही लंबित जनहित याचिका में दाखिल की गई।
दो रोहिंग्या प्रवासी मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर ने पहले जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर भेदभाव और हिंसा के कारण म्यामां से भागकर भारत आने वाले 40,000 शरणार्थियों को उनके देश भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी थी।
असम के हिरासत शिविर में करीब 32 रोहिंग्या शरणार्थी है। इनमें से नाबालिग समेत करीब 15 रोंहिग्या शरणार्थी तेजपुर में हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इनमें से ज्यादातर म्यांमार के रखाइन राज्य के हैं जिन्हें साल 2014 में रेलवे पुलिस ने पकड़ा था।
भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या
पिछले कई वर्षों से हजारों की संख्या में म्यांमार के पश्चिमी तटवर्ती इलाके रखाइन में रहनेवाले रोहिंग्या मुसलमान पुलिस और कट्टरपंथी रोहिंग्या के बीच छिड़ी खूनी लड़ाई के चलते वहां से भागने के मजबूर हुए। ज्यादातर ये रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश गए लेकिन उनमें कुछ सीमा पार कर भारत आ गए। भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान ऐसा मानते हैं कि भारत में ऐसे शरणार्थियों की संख्या करीब 40 हजार है।